ईमानदार मेहनत
खेत को देखभाल, धैर्य और निरंतरता का सम्मान करना चाहिए।
किसानु के बारे में
हम खेती वैसे करते हैं जैसे धरती चाहती है, साफ, ईमानदार, और अगली पीढ़ी के किसानों के लिए टिकाऊ।
किसानु कृषि संरक्षण, व्यावहारिक तकनीक और निष्पक्ष संचालन मॉडल को जोड़कर ग्रामीण आजीविका मजबूत करता है और भूमि व स्वामित्व अधिकारों की रक्षा करता है।
किसानु के पीछे की कहानी
गांव की पगडंडियों से लेकर खेतों की मेड़ों तक, लोग उन्हें आदर से 'किसानु' कहते थे। वे बद्रीप्रसाद जी के बेटे थे, लेकिन अपनी कर्मठता से वे पूरे इलाके के लिए किसानु बन गए।
हम सबने अपनी इन छोटी आंखों से उन्हें वो काम करते देखा जो उस दौर में बहुत कम लोग कर पाते थे। उनके खेतों की मिट्टी की खुशबू और घर के खाने का स्वाद, सब कुछ एकदम असली और पवित्र था। बैलों के गले में बंधी घंटियों की आवाज के साथ जब हल चलता, तो लगता जैसे जमीन कोई पुराना राग गा रही हो। तीनों मौसमों की फसलें ऐसी लहलहातीं कि घर के कोठार और भंडार हमेशा भरे रहते। फसल की ऐसी बरकत थी कि कभी किसी चीज की कमी नहीं हुई।
दादाजी का रहन-सहन जितना सादा था, उनका खान-पान उतना ही समृद्ध था। उन्हें अवध के पारंपरिक और पुराने पकवान बेहद प्रिय थे। सत्तू, चूनी की रोटी, अरहर की दाल भरी रोटी, सरसों के तेल में कुचली हुई लहसुन-मिर्च की तीखी चटनी, कढ़ी, फरा और उड़द दाल के बड़े, इन सब व्यंजनों का स्वाद उनके साथ बैठकर ही दुगना हो जाता था।
दोपहर होते ही दादाजी के साथ कुट्टी की मशीन पर जाना हमारा सबसे पसंदीदा वक्त था। भूसा, हरी बरसीम और चरी को जब वे हाथ से चलने वाली कुट्टी मशीन में डालते, तो हम सब भी उनके बड़े और मजबूत हाथों के ऊपर अपने छोटे-छोटे हाथ रख देते थे। मशीन का वो चक्का घूमता और हरी घास की सोंधी खुशबू हवा में तैर जाती। चारा कटने के बाद जब हम छोटी भैंस और बछड़ों के आगे डालते, तो वे अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से हमें देखते। हम उनके कान सहलाते, उनके साथ खेलते और उनके ऐसे नाम रखते जो सीधे हमारे दिलों से निकलते थे।
खेतों से लौटकर जब शाम को लालटेन की मद्धम रोशनी में, हम स्कूल की छुट्टियों का होमवर्क लेकर बैठते, तो गणित के कठिन और उलझे हुए सवाल हमें डराने लगते थे। तब दादाजी अपनी ऐनक ठीक करते, हम सबको पास बिठाते और मुस्कुराते हुए उन मुश्किल सवालों को इतने आसान घरेलू उदाहरणों से समझा देते कि मैथ्स का डर चुकटियों में गायब हो जाता। उनकी वो समझ, वो सलीका और जिंदगी को देखने का वो सहज नजरिया आज भी हमारे बड़े फैसलों में हमारा मार्गदर्शन करता है।
और सच तो यह है कि भारत के हर घर में, हर गांव में और हर कस्बे में एक ऐसी ही शख्सियत मौजूद है। आपके, हमारे और हम सबके दादाजी में कहीं न कहीं वही 'किसानु' बसते हैं, जो अपनी सादगी और संस्कारों से पूरी पीढ़ी को सींचते हैं। स्वर्गीय श्री राम सुंदर शुक्ल जी आज भी हमारे विचारों में, हमारे काम में और किसानु के उसी खूबसूरत सपने में जिंदा हैं।
आज भी जब हम शहर की भागदौड़ से थककर आंखें मूंदते हैं, तो बचपन की हर गर्मी की छुट्टियां एक सिनेमा की तरह तैर जाती हैं। दोपहर की चिलचिलाती धूप में नीम की छांव और सामने मुस्कुराते खड़े स्वर्गीय श्री राम सुंदर शुक्ल जी। वे दिन हमारे दिलों के सबसे करीब हैं। दादाजी एक ऐसे किसान थे जिनके हाथों में जैसे कोई कुदरती जादू था। वे सिर्फ जमीन पर पसीना नहीं बहाते थे, वे तो मिट्टी की हर धड़कन को सुनते थे और उसे जीते थे।
हमें आज भी याद है, आंगन में मटर और सरसों के चमकते हुए बीजों का वो बड़ा सा ढेर, धूप में सोने जैसी चमकती गेहूं की बालियां, और वो खास सफेद, आधा टूटे चावल जिन्हें दो-तीन साल तक मिट्टी के बड़े-बड़े मटकों में सहेजकर रखा जाता था। जब वे मटके खुलते, तो पूरे घर में एक सोंधी सी महक फैल जाती थी।
हमारे आंगन में बंधी रत्ना और मुर्रा नस्ल की वो भूरी भैंस, हमारी गायें, और सुबह-शाम दूध-दही का वो भारी काम, ये सब मिलकर हमारे घर को एक मुकम्मल परिवार बनाते थे। उस घर की आबोहवा में एक अजीब सा अनुशासन था, वहां अपनापन भी अगाध था और मर्यादा का कायदा भी कड़ा था।
सिर्फ पशु ही नहीं, हमारे हिस्से के पेड़ों के भी अपने नाम थे जिन्हें दादाजी ने बड़े चाव से रखा था। हर महुआ और हर आम का अपना एक वजूद था। जैसे बेलहवा, जो अपनी बनावट में बेल के पेड़ जैसा दिखता था, और कलमियहवा, जो कलमी आम की गुठली से निकला एक बेहद खूबसूरत सीडलिंग था। दादाजी अक्सर हमें इन पेड़ों के पास ले जाकर कहते थे कि बच्चों, पेड़ सिर्फ फल नहीं देते, ये परिवार के वो बुजुर्ग हैं जो चुपचाप छाया देना जानते हैं।
उनसे सीखी सचाई, ईमानदारी और उसूलों की बातें आज भी विपरीत समय में हमारी रीढ़ की हड्डी बनकर खड़ी रहती हैं। स्वर्गीय श्री राम सुंदर शुक्ल जी हमारे लिए सिर्फ एक किसान या हमारे दादाजी नहीं थे। वे हमारे पहले गुरु थे, घर के सबसे मजबूत स्तंभ थे, और एक ऐसी जीती-जागती मिसाल थे जो यह सिखा गए कि दुनिया में चाहे कितनी भी चमक-दमक आ जाए, अपनी जमीन, अपनी सचाई और अपने उसूलों को कैसे पूरी गरिमा के साथ निभाया जाता है।
हम क्या आगे लेकर चलते हैं
खेत को देखभाल, धैर्य और निरंतरता का सम्मान करना चाहिए।
एक पेड़, एक खेत या एक पट्टा निजी और पारदर्शी महसूस होना चाहिए।
अच्छी खेती मौसमों के लिए बनती है, शॉर्टकट के लिए नहीं।
हमारे काम की दिशा
ये सिर्फ दीवार पर लिखे शब्द नहीं हैं। इन्हीं से तय होता है कि हम उत्पाद कैसे चुनते हैं, साझेदारी कैसे बनाते हैं, किसानों से कैसे बात करते हैं और परिवारों को प्रमाण कैसे दिखाते हैं।
हम प्राकृतिक इनपुट, सोच-समझकर फसल योजना और ऐसी खेती को बढ़ावा देते हैं जिससे मिट्टी, पानी और पेड़ अगले मौसम तक स्वस्थ रहें।
हर कार्यक्रम में स्थानीय किसान केंद्र में रहते हैं। तकनीक रिकॉर्ड और फैसलों में मदद करती है, लेकिन खेत का काम गांव के अनुभव से ही चलता है।
चाहे पेड़ हो, उत्पाद हो, लीज हो या साझेदारी, जरूरी जानकारी साफ रखी जाती है ताकि परिवारों और साझेदारों को सही स्थिति पता रहे।
हम ऐसे कार्यक्रम बनाते हैं जो किसान आय, परिवारों के भरोसे और ग्रामीण संपत्ति को वर्षों तक सहारा दें, सिर्फ एक मौसम तक नहीं।
किसानु क्यों है
किसानु सिर्फ उत्पाद ब्रांड या भूमि कार्यक्रम नहीं है। यह पारंपरिक खेती के संस्कार और आधुनिक जवाबदेही के बीच एक व्यावहारिक पुल है।
मिशन
हम किसानों, परिवारों, भूमि मालिकों और साझेदारों को साफ रिकॉर्ड, निष्पक्ष मॉडल और खेत तक पहुंचने वाले व्यावहारिक सहयोग से जोड़ते हैं।
विजन
हम ऐसा ग्रामीण तंत्र बनाना चाहते हैं जहां मिट्टी स्वस्थ रहे, किसान आय स्थिर हो और परिवार असली खेतों से पारदर्शी तरीके से जुड़ सकें।
जड़ों की समझ
हम धैर्य, मौसम दर मौसम देखभाल, नाम वाले पेड़, सहेजा हुआ अनाज, पशु सेवा और ईमानदार व्यवहार जैसी गांव की समझ को आधुनिक प्रमाणों के साथ आगे बढ़ाते हैं।
भरोसा और व्यवस्था
एक अच्छी ग्रामीण पहल किसान, भूमि मालिक, खरीदार और संस्था, सभी की सुरक्षा करती है। इसलिए किसानु स्वामित्व, संचालन, पूंजी और रिकॉर्ड को अलग और स्पष्ट रखता है।
हम किनके साथ काम करते हैं
किसानु जिम्मेदार वृद्धि के लिए बना है: व्यावहारिक, मापनीय और खेत की वास्तविकताओं पर आधारित।
किसानु कैसे काम करता है
हर कार्यक्रम जमीन की सच्चाई से शुरू होता है। हम मौजूदा स्थिति दर्ज करते हैं, भूमिकाएं तय करते हैं, सुरक्षा मानकों के साथ काम करते हैं और अगले मौसम के सुधार की समीक्षा करते हैं।
किसान, भूमि मालिक और स्थानीय हितधारक लक्ष्य, जोखिम और अपेक्षित परिणामों पर सहमति बनाते हैं।
किसी भी हस्तक्षेप से पहले मिट्टी, पानी, फसल इतिहास और ढांचे का रिकॉर्ड बनाया जाता है।
ऑपरेशनल प्लेबुक और भूमिका सीमाएं स्वामित्व व जवाबदेही को स्पष्ट रखती हैं।
डैशबोर्ड और मौसमी समीक्षा से तय होता है कि क्या सुधारना, दोहराना या रोकना है।
भरोसे के लिए बना
मिट्टी याद रखती है कि उसकी देखभाल किसने की। किसानु उन लोगों के लिए बना है जो खेती को फिर से ईमानदार महसूस करना चाहते हैं: धरती से जुड़ी, किसानों के प्रति सम्मानपूर्ण, परिवारों के लिए साफ, और पीढ़ियों तक गांवों की सेवा करने लायक मजबूत।
IoT
Google Cloud
Amazon AWS
NVIDIA AI
Kisaanu, Startup India और DPIIT के साथ पंजीकृत है, और ज़िम्मेदार ग्रामीण नवाचार को सहयोग देने वाली संस्थाओं के साथ काम करता है।

StartInUP
DPIIT-StartUp India
Invest UP
Awadh Innovation Foundation
AI संचालित
रसायन-मुक्त संचालन
कार्बन न्यूट्रल
एग्रीटेक साझेदार
10वीं मंजिल, परिणी क्रेसेंजो, जी ब्लॉक, बीकेसी, बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स, बांद्रा पूर्व, मुंबई, महाराष्ट्र